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कुर्सी गई, लेकिन नहीं झुके CM, इंदिरा गांधी के दौर में यूपी की सबसे चर्चित सियासी कहानी

UP News: सत्ता के शिखर पर बैठे एक मुख्यमंत्री… सामने देश की सबसे ताकतवर नेता इंदिरा गांधी… और बीच में टकराया स्वाभिमान. यह कहानी है उत्तर प्रदेश के उस मुख्यमंत्री की, जिसने राजनीतिक दबाव के आगे झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों को प्राथमिकता दी. एक दौर में जिनकी आवाज लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सुनी जाती थी, वही नेता कुछ समय बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने को मजबूर हुए. आखिर कौन थे हेमवती नंदन बहुगुणा? क्यों बढ़े उनके और इंदिरा गांधी के बीच मतभेद और कैसे एक बड़ा राजनीतिक फैसला उत्तर प्रदेश की सियासत का यादगार अध्याय बन गया? आइए जानते हैं उनकी दिलचस्प कहानी.

कौन थे हेमवती नंदन बहुगुणा?

हेमवती नंदन बहुगुणा का जन्म 25 अप्रैल 1919 को गढ़वाल (तत्कालीन संयुक्त प्रांत, वर्तमान उत्तराखंड) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. छात्र जीवन से ही उनका झुकाव स्वतंत्रता आंदोलन की ओर था. भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा. आजादी के बाद उन्होंने कांग्रेस संगठन में तेजी से अपनी पहचान बनाई. उनकी संगठन क्षमता, प्रभावशाली भाषण शैली और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत पकड़ ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अलग पहचान दिलाई.

कैसे बने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री?

साल 1973 में कांग्रेस नेतृत्व ने कमलापति त्रिपाठी की जगह हेमवती नंदन बहुगुणा को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया. 8 नवंबर 1973 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इसके बाद 1974 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला और बहुगुणा एक बार फिर मुख्यमंत्री बने. उस समय उत्तर प्रदेश देश की राजनीति का सबसे प्रभावशाली राज्य माना जाता था और यहां का मुख्यमंत्री राष्ट्रीय राजनीति में भी अहम भूमिका रखता था.

जब देश इमरजेंसी के दौर से गुजर रहा था

साल 1975 भारतीय लोकतंत्र का सबसे चर्चित दौर माना जाता है. 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई. विपक्ष के कई बड़े नेता जेल भेज दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और सत्ता का पूरा नियंत्रण केंद्र सरकार के हाथों में सिमटने लगा.  इससे पहले 1971 के चुनाव और बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा गांधी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी. लेकिन 1974-75 के दौरान महंगाई, छात्र आंदोलन, जेपी आंदोलन और राजनीतिक अस्थिरता ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया. फिर 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली चुनाव मामले में इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया. इसके कुछ ही दिनों बाद पूरे देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई. इस दौर में राज्यों के मुख्यमंत्री भी सीधे दिल्ली के फैसलों से प्रभावित होने लगे.

यहीं से बढ़ने लगे मतभेद

इमरजेंसी लागू होने के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के बीच धीरे-धीरे दूरी बढ़ने लगी. उनकी जीवनी “Hemwati Nandan Bahuguna: A Political Crusader” के अनुसार, बहुगुणा लोकतांत्रिक संस्थाओं और पार्टी संगठन की भूमिका को काफी महत्व देते थे. वहीं उस समय इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निर्णय लेने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक केंद्रीकृत होती जा रही थी. इसी वजह से दोनों नेताओं के बीच मतभेद बढ़ते गए. The Indian Express में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, इमरजेंसी के दौरान बहुगुणा और संजय गांधी के बीच भी दूरी बढ़ गई थी. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यही घटनाक्रम आगे चलकर उनके राजनीतिक भविष्य पर भारी पड़ा.

फिर छोड़नी पड़ी मुख्यमंत्री की कुर्सी

लगातार बढ़ते मतभेदों के बीच 29 नवंबर 1975 को हेमवती नंदन बहुगुणा ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया. इसके बाद नारायण दत्त तिवारी को उत्तर प्रदेश का नया मुख्यमंत्री बनाया गया. इतिहासकार इस पूरे घटनाक्रम को उस समय कांग्रेस के भीतर बदलते शक्ति संतुलन और केंद्रीय नेतृत्व के बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखते हैं. उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड यह नहीं बताते कि सिर्फ एक वजह से उन्हें हटाया गया था, लेकिन इतना जरूर दर्ज है कि बहुगुणा और केंद्रीय नेतृत्व के बीच मतभेद काफी गहरे हो चुके थे.

कांग्रेस से भी बना ली दूरी

मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भी बहुगुणा सक्रिय राजनीति में बने रहे. 1977 में जब इमरजेंसी खत्म हुई और देश में आम चुनाव हुए, तब उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी. इसके बाद उन्होंने जगजीवन राम और नंदिनी सत्पथी के साथ मिलकर Congress for Democracy का गठन किया. बाद में यह दल जनता पार्टी के साथ शामिल हो गया. उस समय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि उत्तर प्रदेश में बहुगुणा का प्रभाव कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान साबित हो सकता है. कहा जाता है कि स्वयं इंदिरा गांधी ने भी स्वीकार किया था कि उत्तर प्रदेश में बहुगुणा की लोकप्रियता कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकती है.

क्यों आज भी याद किया जाता है यह किस्सा?

हेमवती नंदन बहुगुणा की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री के पद छोड़ने की कहानी नहीं है. यह उस दौर की भी कहानी है, जब देश इमरजेंसी जैसे कठिन समय से गुजर रहा था, कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन बदल रहा था और राज्यों तथा केंद्र के रिश्तों का नया स्वरूप सामने आ रहा था. इसी वजह से उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे चर्चित अध्यायों में आज भी हेमवती नंदन बहुगुणा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है. उनकी राजनीतिक यात्रा यह बताती है कि सत्ता और संगठन के बीच मतभेद किस तरह इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं और कई बार राजनीतिक स्वाभिमान की कीमत सत्ता छोड़कर भी चुकानी पड़ती है.

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