Friday, July 19

राजेंद्र शर्मा के तीन लघु व्यंग्य

1. पर इस्तीफा कभी नहीं

यह तो विरोधियों की घनघोर टाइप की ज्यादती है। पहले इसकी रट लगा रखी थी कि नीट परीक्षा में गड़बड़–घोटाले के लिए नैतिक जिम्मेदारी लो। शिक्षा मंत्री ले‚ एनटीए के निदेशक ले‚ कोई तो नैतिक जिम्मेदारी लो। और अब जब धर्मेंद्र प्रधान जी ने नैतिक जिम्मेदारी मान ली है‚ तो भाई लोगों ने अपनी डिमांड बढ़ा दी और लगे मंत्री जी का इस्तीफा मांगने। जिम्मेदारी लेने की बात से सीधे इस्तीफा देने की मांग पर आ गए ; ऐसी धोखाधड़ी इस अपोजीशन की!

वह तो अच्छा हुआ कि मोदी जी ने अपने राज के शुरू में ही साफ कर दिया था कि कुछ भी हो जाए‚ उनकी सरकार में किसी का इस्तीफा नहीं होगा। माने छुट्टी भी‚ नई भर्ती भी‚ सब कुछ होगा तो सही ; पर वही होगा, जो मोदी रचि राखा होगा। पर दूसरों के कहने से ही नई भर्ती‚ इस्तीफा‚ कुछ नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि इतना साफ–साफ कह देने के बाद भी मोदी जी कोई इस्तीफों की मांग से साफ बच गए हों। गुजरे दस साल में इस्तीफे की मांग का शोर उठा‚ बार–बार उठा। पर इस्तीफा मांगने वाले जानते थे कि कुुछ भी हो‚ इस्तीफा नहीं मिलेगा। पब्लिक सब देख–समझ रही थी कि कोई कुछ भी कर ले‚ इस्तीफा नहीं होगा। सो इस्तीफा नहीं हुआ। और जब बाकी किसी का वैसा वाला इस्तीफा भी नहीं हुआ कि पब्लिक मांगे और ना–ना करते–करते मंत्री आखिर में इस्तीफा दे डाले‚ फिर किसी के मोदी जी का इस्तीफा मांगने का तो सवाल ही कहां उठना था। छप्पन इंच की छाती इंतजार ही करती रह गई‚ पर उसे इस्तीफे की मांग को खारिज करने का‚ मौका ही नहीं मिला।

सब अच्छा–भला चल रहा था‚ न कोई इस्तीफा‚ न इस्तीफे की मांग का ज्यादा कोई शोर। पर तभी पब्लिक पगला गई। चार सौ पार वालों को‚ तीन सौ से भी नीचे खिसका दिया। मोदी जी के सिंहासन की टांगें तोड़कर‚ नीतीश और नायडू की बैसाखियां फिट कर दीं। ऊपर से पहले दिन से इस्तीफे की मांग पर मांग। नीट और नेट के लिए प्रधानजी का इस्तीफा ; कंचनजंगा एक्सप्रेस दुर्घटना के लिए वैष्णव जी का इस्तीफा ; जम्मू–कमीर में आतंकवादी वारदातों के लिए शाह साहब का इस्तीफा। यूं ही चला तो इस बार डिमांड कहीं मोदी जी के इस्तीफे तक न पहुंच जाए। सो और जोर से बोलो‚ इस्तीफा कभी नहीं!
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*2. ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी!*

आपको क्या लगता है, धर्मेंद्र प्रधान जी को सिर मुंडाते ही ओले पड़े वाली फीलिंग आ रही होगी? जिस दिन मोदी की तीसरी पारी वाला नतीजा आया, उसी रोज नीट-यूजी का नतीजा निकाला। फिर भी नीट में घोटाले का शोर मच गया। ईवीएम तो छूट गयी, पर एनटीए की गर्दन फंस गयी। गर्दन भी ऐसी फंसी, ऐसी फंसी कि मंत्री जी जितने कहें कि सब चंगा सी, लोग उतना ही शोर मचाकर फंदा कसते जाएं कि सब घपला सी। हार के मंत्री जी बोले थोड़ा-बहुत घपला सी, पर बाकी सब चंगा सी, तो इसका शोर और तेज हो गया कि सब घपला ही सी। मंत्री जी ने कहा मैं नैतिक जिम्मेदारी लेता हूं, तो लोगों ने और शोर मचा दिया कि लेने का मोह छोड़कर, आप तो बस दो — इस्तीफा। तब तक उसी एनटीए की यूजीसी-नेट की परीक्षा का पर्चा लीक हो गया और परीक्षा रद्द हो गयी। फिर उसी की सीआइएसआर वाली परीक्षा स्थगित हो गयी। फिर नीट-पीजी की परीक्षा। यानी ओले ही ओले और वह भी सिर मुंडाते ही।

पर सिर मुंडाते ही वाली फीलिंग हर्गिज नहीं है। क्यों? क्योंकि जिस बेरोजगारी का इस बार के चुनाव में इतना हल्ला था, बल्कि जिसके चक्कर में ही चार सौ पार के एलान करने वाले मोदी जी को तीन सौ तक पहुंचना नसीब नहीं हुआ, मोदी 3.0 की तरफ से प्रधान जी ने तो उसका पक्का समाधान ही शुरू कर दिया है। पहले सौ दिन का रोडमैप! वैसे रोडमैप सिंपल है। ओन्ली परीक्षा पर चर्चा, नो पर्चा! अव्वल तो परीक्षा ही नहीं और परीक्षा हो भी जाए, तो पर्चा लीक यानी सिर्फ परीक्षा, नो नतीजा। प्रवेश परीक्षा का नतीजा नहीं, तो एडमीशन नहीं। एडमीशन नहीं, तो डिग्री-विग्री भी नहीं। न डिग्री, न डिग्रीधारी, तो रोजगार की मांग भी नहीं। बेरोजगारी का जड़ से और शर्तिया इलाज, ना रहे बांस, ना रहे बांसुरी वाला! शिक्षा वाले भी जड़ से इलाज नहीं बताएंगे, तो और कौन बताएगा!

मोदी 3.0 में जड़ से इलाज, सिर्फ इस-उस प्रवेश परीक्षा तक ही नहीं रहेगा। एनसीईआरटी ने पाठ्य पुस्तकों में जड़ से इलाज पहले ही शुरू भी कर दिया है। कौन इंतजार करता है, चुनाव-वुनाव के नतीजे आने तक! ग्यारहवीं, बारहवीं की इतिहास की किताबों में अब सिर्फ राम मंदिर आंदोलन है, बाबरी मस्जिद सिरे से गायब है। इतने सिरे से कि उससे भव्य मंदिर के लिए जगह खाली कराए जाने तक का जिक्र नहीं है। असल में तो बाबरी मस्जिद के कभी रहे होने का ही जिक्र नहीं है। और बात भी सही है। मस्जिद तो खैर नहीं ही रही, पर उसके नाम के रूप में झगड़े की जड़ भी क्यों रहे? सो मस्जिद का नाम ही मिटा दिया। न रहेगी झगड़े की जड़ और न रहेगा झगड़ा। जब मस्जिद ही नहीं थी, तो उसका ध्वंस कैसा और मस्जिद का ध्वंस ही नहीं, तो उसके बाद का खून-खराबा कैसा? इसीलिए, 2002 का गुजरात का खून-खराबा भी मिटा दिया। अव्वल तो मोदी जी के सीएम रहते हुए कुछ खास हुआ हो, ऐसा नहीं हो सकता। और अगर कुछ हुआ भी, तो भी बुरा ही हुआ और जो बुरा हुआ, उसे याद करने का क्या फायदा? वह दिन दूर नहीं, जब किताबों से अंगरेजी राज भी मिट जाएगा। बस गांधी जी यहां भी दिक्कत खड़ी करने से बाज नहीं आएंगे। गोलियां दगना तो किताबों से मिटा भी देंगे, पर उस चक्कर में गोडसे का नाम भी तो मिट जाएगा। इतनी आसान भी नहीं है डगर, ना रहेगा बांस वाले पक्के इलाज की!

अब प्लीज ये बचकाना सवाल मत पूछने लग जाना कि जब बांस, बांसुरी, कुछ भी नहीं रहेगा, तो अपने मोदी जी चैन की बांसुरी कैसे बजाएंगे? ये किसने कहा कि बांसुरी बांस से ही बन सकती है। मोदी जी स्पेशल बांसुरी बजाएंगे, अडानी जी की गिफ्ट की हुई, सोने की बांसुरी! शौक बड़ी चीज है!
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*3. ये दुश्मनी वो नहीं छोड़ेंगे!*

भई दुश्मनी हो तो मोदी जी जैसी हो, नहीं तो नहीं हो। पट्ठे केजरीवाल से दुश्मनी ठान ली, तो ठान ली। अब लाख चुन ले, दिल्ली की पब्लिक सीएम की कुर्सी पर बैठाने के लिए। हजार बार अड़ जाए, अगला जान छूट जाए, पर कुर्सी नहीं छोडूं की जिद पर ; मोदी जी ने तिहाड़ की हवा खिलाने की ठान ली, तो तिहाड़ की हवा खिलाकर ही माने। सॉरी! हवा खिलाकर भी माने कहां हैं। अब भी तिहाड़ की हवा खिलाइंग एंड खिलाइंग एंड खिलाइंग!

विरोधियों ने क्या सोचा था? चुनाव में मोदी जी की बासठ-तिरेसठ सीटें कम हो गयी हैं, अपने बूते बहुमत से गैर-बहुमत में आ गए हैं, यूपी तक में अर्श से फर्श पर आ गए हैं, नायडू-नितीश की बैसाखियों के सहारे ही पीएम की गद्दी पर चढ़ पा रहे हैं, तो क्या मोदी जी अपनी दुश्मनी छोड़ देंगे? नायडू-नीतीश के सहारे हैं, तो क्या मोदी जी भागवत की बात मानकर, विरोधियों को दुश्मन तो छोड़ ही दो, विरोधी भी नहीं, सिर्फ प्रतिपक्षी मानने लग जाएंगे ; दुश्मनी भूलकर गले लगाने लग जाएंगे! कभी नहीं। अपना बस चलते तो केजरीवाल को जेल से बाहर आने नहीं देंगे। कर ले बंदा बाहर आने की कितनी भी कोशिशें! देखा नहीं कैसे निचली अदालत ने अगले को जमानत दे दी, तो मोदी जी की ईडी नंगे पांव हाई कोर्ट में पहुंच गयी, जमानत रोकी जाए, वर्ना बड़ा गजब हो जाएगा; भारतवर्ष खतरे में आ जाएगा। हाई कोर्ट ने फौरन तो राष्ट्र को बचा दिया, पर सुप्रीम कोर्ट के दखल देकर जमानत बहाल करने का खतरा तो राष्ट्र पर अब भी मंडरा रहा था। सो रिले रेस में शाह जी ने सीबीआइ को आगे कर दिया और सीबीआइ ने जेल से ही गिरफ्तारी कर के दूसरा ही राउंड शुरू कर दिया। अब ईडी के केस वाली जमानत किस काम की ; बंदा तो जेल में ही रहेगा।

और अगर सीबीआइ वाले मामले में भी किसी तरह से जमानत मिल गयी तो? तो क्या, मोदी जी ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। अदालत देख ले जमानत देकर। जरूरत पड़ी, तो अरविंद नाम वालों के लिए विशेष अध्यादेश ले आएंगे, पर जेल के फाटक से बाहर अगले के कदम नहीं पडऩे दिए जाएंगे। इमर्जेंसी का सबक — जब बिना इमर्जेंसी के ही विरोधी मुख्यमंत्रियों को जेल में डाले रखा जा सकता हो, तो मोदी जी इमर्जेंसी क्यों लगाएं!

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