
बरसों पहले हमारे बड़े बुजुर्ग किसी अयोग्य युवक के बारे मे कटाक्ष करते हुए ये ताना मारा करते थे। आज के समय मे इसे यूं कहना ठीक होगा कि ‘सरकार दे खाने को तो कौन जाए कमाने को’
मुफ्त की रेवड़ी
सुप्रीम कोर्ट ने ज्वलंत प्रश्न उठाया कि यदि नागरिकों को हर चीज मुफ्त में देंगे तो वे काम क्यों करेंगे। आप लोगों को रोजगार दें ताकि वे गरिमा से कमा सकें।
*जीने के लिये आवश्यक वस्तुएं मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली, मुफ्त गैस, मुफ्त घर के अलावा खाते में पैसे भी डालेंगे मुफ्त यानि बिना काम किये तो लोग काम क्यों करेंगे।*
सीजेआई सूर्यकान्त, जस्टिस जाॅयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने तमिलनाडु पावर डिस्टीब्यूशन कंपनी की याचिका पर सुनवाई के दोरान ये बातें कहीं।

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो खर्च उठा सकते हैं और जो नहीं उठा सकते उनके बीच अंतर रखे बिना सरकारी सुविधाएं बांटना तुष्टिकरण है। पीठ ने कहा कि हम सिर्फ तमिलनाडु की नहीं बल्कि सारे देश की बात कर रहे हैं।
गले की हड्डी
कानूनी रिश्वत
एक तरह से ये अच्छा ही हुआ देश की सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी टिप्पणी की। वास्तविकता तो ये है कि देश में ये जो फोकट का माल खाने की परम्परा नेताओं ने कायम कर दी है वो एक तबाही की ओर इशारा कर रही है।
सरकारें ऐसी मुफ्त योजनाएं चला रही हैं।
*बच्चे को जन्म से लेकर युवा होते तक और शादी तक और फिर उसकी शिक्षा, उसका खाना-पीना यानि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं जिसे पूरा न कर रही हो।*
इसके अलावा चुनाव के समय रिझाने के लिये नगद रूप्ये या एकाउन्ट में पैसे और साईकिल, लैपटाॅप और ऐसे ही अन्य सामान फोकट में देने के वायदे करना आम बात हो गयी है।
पहले और अभी भी ढके-छिपे तौर पर चुनाव आयोग की नजर बचाकर शराब, साड़़ी, नगद व अन्य सामान प्रत्याशियो द्वारा दिया जाता है। लेकिन अब पिछले कुछ वर्षांे से इस रिश्वत को कानूनी जामा पहना दिया गया है। अब खुलेआम पार्टियां अपने घोषणापत्र में ऐसे लालच देकर वोट बटोरती हैं।

ये कानूनी रिश्वत आगे चलकर गले की हड्डी साबित हो रही है। जितना फोकट का माल देने का वादा किया जाता है वो देने से तो सरकारें ही कुछ समय में दिवालिया होने के कगार पर पहुंच रही हैं।
कई मुफ्तखोर साबित होंगे
अयोग्य लाचार बीमार
इसके जो भयानक दुष्परिणाम निकल रहे हैं वे देश को पीछे ढकेल रहे हैं और आम आदमी का जीवन लचर कर रहे हैं।
सुना करते है कि कई बड़े-बड़े उद्योगपति अपनी संतानों को अपनी विरासत सौंपने से पहले उन्हें किसी और के यहां काम करने के लिये भेजा करते थे वो भी बिना अपना परिचय दिये। जिससे वे अपने काम में दक्ष हो सकें।
बिना अपना परिचय दिये, बिना कोई विशेष सुविधाएं लिये संघर्ष के बीच अपना रास्ता बनाने वाला युवक कितना प्रभावी होगा ये अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
आमतौर पर व्यवसायी वर्ग अपने बच्चों को कोई भी काम कराने से पहले उन्हें संबंधित दुकानों में नौकरियां करवाते रहे हैं ताकि वो उस धंधे की उंच-नीच और गहराईयों को समझ सके इससे उसकी सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
जबकि हमारे देश की राज्य सरकारों ने बीपीएल की नौटंकी कर गरीब मगर लायक परिवारों को गर्त में ढकेलने का काम किया है। सरकारें नागरिकांे को पंगु बना रही हैं। उनकी महात्वाकांक्षाओं को तरक्की करने की चाहत को नष्ट कर रही हैं।
*सरकारों पर भी बुरा प्रभाव*
*जो सरकारें अपनी हैसियत से बढ़कर वायदे कर रही हैं और वायदे निभाने के लिये अपने बजट का बड़ा हिस्सा इसमें लगा रही हैं वो अंततः दिवालिया होने की कगार पर पहुंच रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में ये बात अच्छी तरह समझ में आ गयी है। फिर भी चुनाव जीतने के लिये अपनाए जाने वाले घटिया हथकण्डों में ये एक कारगर हथकण्डा है।*
अभी जो सरकारें हैं वे भी अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद खजाना खाली ही छोड़ने वाली हैं ऐसा लगता है।
लेबर के लिये परेशान कारखाने
ऐसी फोकट वाली योजनाओं से लोगों के बीच जीवन जीने का भय समाप्त हो गया है। किसी को इस बात का डर नहीं रहा कि काम पर नहीं जाउंगा तो खाउंगा क्या,,, । इसलिये काम वे अपनी शर्तों पर करते हैं। उन्हें किसी उद्योगपति या दुकानदार की आवश्यकता से कोई लेना-देना नहीं है। वे अपनी मर्जी से काम करते हैं।
जहिर है कि इस रवैये से समाज में लेबर की भारी किल्लत है। इसलिये पिछले लंबे समय से प्राॅडक्टिविटी मार खा रही है।
संभव है भविष्य में ये एक गंभीर बीमारी का रूप ले ले और इसका नुकसान सारे समाज को सहना पड़े।
जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700







