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स्व-सहायता समूह से जुड़कर सुशीला सिंह बनीं आत्मनिर्भर

*बीसी सखी और डिजिटल सेवा केंद्र के माध्यम से बदली जिंदगी, ग्रामीण महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा*

रायपुर, 07 जुलाई 2026/ राज्य शासन की महिला सशक्तिकरण एवं आजीविका संवर्धन योजनाएं ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आर्थिक आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिख रही हैं। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर रही हैं, बल्कि स्वरोजगार अपनाकर समाज में अपनी अलग पहचान भी बना रही हैं। इसी कड़ी में सूरजपुर जिले के ग्राम छतरंग की श्रीमती सुशीला सिंह की कहानी महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरक मिसाल बनकर उभरी है।

कभी कृषि मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करने वाली श्रीमती सुशीला सिंह आज बीसी सखी के रूप में कार्य करते हुए डिजिटल सेवा केंद्र संचालित कर रही हैं। स्व-सहायता समूह से जुड़ने से पहले उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी और परिवार की अधिकांश जिम्मेदारियां उन्हीं पर थीं। सीमित आय के कारण परिवार की जरूरतों को पूरा करना चुनौतीपूर्ण था।

इसी दौरान उन्हें शिवा स्व-सहायता समूह की जानकारी मिली और उन्होंने समूह की सदस्यता ग्रहण की। समूह से जुड़ने के लगभग छह माह बाद उन्हें कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड (सीआईएफ) के तहत ऋण उपलब्ध हुआ। प्राप्त राशि में से 5 हजार रुपये का उपयोग कर उन्होंने बीसी सखी के रूप में कार्य प्रारंभ किया, जिससे उनकी आय में धीरे-धीरे वृद्धि होने लगी।

आर्थिक स्थिति बेहतर होने पर श्रीमती सुशीला सिंह ने लैपटॉप खरीदकर फोटोकॉपी एवं ऑनलाइन सेवा केंद्र की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने कम्प्यूटर, पासबुक प्रिंटर मशीन सहित अन्य आवश्यक उपकरण खरीदे और ग्रामीणों को विभिन्न डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराना प्रारंभ किया। व्यवसाय के विस्तार के लिए उन्होंने स्व-सहायता समूह से 50 हजार रुपये का अतिरिक्त ऋण भी प्राप्त किया।

वर्तमान में उनके व्यवसाय में लगभग 1.50 लाख रुपये का निवेश है तथा अब तक उन्हें करीब 2.70 लाख रुपये का लाभ प्राप्त हो चुका है। उनकी वार्षिक आय लगभग 1.40 लाख रुपये है, जबकि मासिक आय 15 से 18 हजार रुपये तक पहुंच गई है। आज वे अपनी बेटी को बेहतर शिक्षा दिला रही हैं और परिवार की आवश्यकताओं को सम्मानपूर्वक पूरा कर पा रही हैं।

श्रीमती सुशीला सिंह का कहना है कि स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनके जीवन में आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर सकारात्मक परिवर्तन आया है। बढ़ती आय के साथ वे नियमित रूप से ऋण का भुगतान भी कर रही हैं और आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं।

वे राज्य शासन की आजीविका एवं महिला सशक्तिकरण योजनाओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहती हैं कि इन पहलों ने उन्हें गरीबी से उबरने, आत्मविश्वास प्राप्त करने और अपने सपनों को साकार करने का अवसर दिया है। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि उचित मार्गदर्शन, संस्थागत सहयोग और अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं न केवल स्वयं सशक्त बन सकती हैं, बल्कि अपने परिवार, गांव और समाज के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

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