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बंगाल के सिंहासन को लहू सिंचती भी है और प्लावन कर कुशासन को जड़ समेत निर्मूल भी।

जाने पश्चिम बंगाल की सियासत की तासीर ऐसी क्यों है। 1905 से शुरू कर 1946 के डाइरेक्ट एक्शन की बात हो या 1977 के बाद से 2021 तक। इस बंगाल की राजसत्ता ने खुद को टिकाये रखने के लिए। पल्ल्वीत-पुष्पित होते रहने के लिए सिर्फ लहू ही पीया है। बिलकुल ड्राकुला की तरह। उसे सिर्फ रक्त की पिपासा है। 1905 में लार्ड कर्जन का बंगाल विभाजन (हिन्दू -मुस्लिम आबादी के आधार पर ) का इतिहास हो या फिर 16 अगस्त 1946 के बुचड़ मुस्लिम लीगी मुख्यमंत्री हुसैन शाहिद सुहरावर्दी का डायरेक्ट एक्शन।
स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल में 1947 में बनी कांग्रेस की सत्ता 1977 में धराशायी होने के बाद 1977 से 2011 तक 7 बार वाममोर्चा की सत्ता रही हो या फिर 2011 से 2021 तक की निवर्तमान ममता बनर्जी की तृणमूल सत्ता। बंगाल की ‘ ड्राकुला’ सत्ता ने ज्योति बासु से लेकर 2021 तक अपने ही लाखों निरीह नागरिकों का खून पीती खिलखिलाती सिंहासन को सींचती रही है।
बंगाल के रक्त रंजीत या ‘रक्त चरित्र ‘ राजनीति की शुरुआत होती है
30 अप्रेल 1982 में कोलकाता के बीजान सेतु पर आनंदमार्गी साधुओं का पीट -पीट कर मारे जाने की घटना से। जिसमें एक साध्वी सहित 16 साधुओं को टेक्सी से खींच कर हजारों लोगों के बीच वामपंथियों द्वारा पीट -पीट कर मार डाला जाता है। उसके बाद उन्हें वहीं जला दिया जाता है। उसके बाद से शुरू होती है नेहरू -इंदिरा कांग्रेस की तर्ज पर मुस्लिम तुष्टिकरण पोषित वोट बैंक वाली राजनीति की। बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने 1982 के बाद अपनी सत्ता को बनाये रखने का मूलमंत्र बना लिया, मुस्लिम वोट बैंक और काडर का अराजक बल के जोर पर सत्ता दखल का रक्त चरित्र।
यही राजनीति आगे चल कर बंगाल के आम चुनावों के” पूर्व और बाद ” रक्त चरित्र की पटकथा बन गई। बंगाल में आम चुनाव से लेकर निगम -पंचायत चुनाव तक। हर चुनाव और वोटिंग में हत्या और आगजनी। बूथ दखल से लेकर बमबाजी और विरोधियों को रोकने बलात्कार से लेकर लोम्हार्षक मार -पिटाई तक। बंगाल की सत्ता को बनाये रखने का मूलमंत्र बन गया। लोकतान्त्रिक वोटिंग पर्व व्यवस्था को निरंकुश राक्षसी हवन कुंड में बदल दिया गया। इस हवन कुंड के लिए बंगाल के भद्र और सनातनी हिन्दू वोटर समीधा बना दिए गए। क्यों कि बंगाल के मूल निवासी सनातनी हिन्दू अपने संस्कार और जागृति के लिए आज भी अपनी पहचान को बनाये रखा है। क्रांति और विद्रोह इनका चरित्र रहा है। परिवर्तन ही इनकी शैली रही है।
इनकी इसी जागरूकता के डर से वाममोर्चा शासन काल से शुरू कर आज की तृणमूल सरकार तक में इन्हें ही टार्गेट किया गया। इनकी एक जुटता कभी भी सत्ता बदल सकती थी। नतीजा इन्हें मतदान से दूर रखने। डरा कर रखने की राजनीति को परवान चढ़ाए रखा गया। हिन्दू वोटरों की बाड़बंदी करने से लेकर सत्ता पक्ष में जबरिया वोटिंग के लिए मजबूर किया गया। सत्ता पिपासुओ को फिर भी भरोसा नहीं था। इसलिए मुस्लिम तुष्टिकरण की हर पराकाष्ठा की हद को पार किया जाता रहा। बांग्लादेश के बांग्लादेशियों से लेकर रोहंगियायों तक को प्रवेश करा कर उन्हें वोटिंग अधिकार, आधार, पैन कार्ड मुहैया कराए गए। सीमांचल इलाके की भूमि, गांव, शहर की जमीनों पर कब्जा करने की छूट दे दी गई। यहां तक की पश्चिम बंगाल के करीब 100 विधानसभा सीटें इनके कब्जे में है। मूल सनातनी हिन्दू बंगाली अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा, रामनवमी, होली से लेकर शोभा यात्रा, मूर्ति विसर्जन, मुस्लिम वोटर बहुल इलाके के मंदिर तक दहशत में है। हद तो यह कि 2026 के चुनावी माहौल में यहां की मुख्यमंत्री यह तक धमकी देने की जुर्रत करती है – यदि तृणमूल को फिर से सत्ता पर बरकरार नहीं रखा तो एक विशेष वर्ग मात्र एक मिनट में तुम्हारा कत्लेआम कर देगा। अकबरूदिन ने तो 15 मिनट मांगा था। हिमाकत देखिये कोलकाता का मेयर फिरहाद हकीम हिन्दुओं को खुलेआम दावते दिन देते हुए इस्लाम में जन्म लेने को नेमत बताता है। ग्रेटर कोलकाता के एक मंच से एक मौलाना रोहगिंयाओं को अपना भाई बताते हुए NRC, CAA पर देश की सत्ता को चुनौती देने की हिम्मत रखता है। टीपू सुल्तान मस्जिद का ईमाम बरकती मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बड़ा गोश्त खिलाने की बाते कहता है। हुमायूं कबीर बाबरी मस्जिद की आधारशीला रख कर 1000 करोड़ की पेशकश का दम भरता दिखता है.
इसके बावजूद बंगाल के भद्र लोगों ने। यहां के सनातनी हिन्दू वोटरों ने जब भी सत्ता की धमक में मौजूदा सरकारों की नादिरशाही की पानी को सर से ऊपर जाते देखा है। चाहें सिद्धार्थ शंकर राय की कांग्रेस की सत्ता रही हो या फिर ज्योति बासु / बुद्धदेव भट्टाचार्य की 34 साल की वाममोर्चा सरकार। उसे ऐसे उतार फेंका कि आज कांग्रेस और वाममोर्चा अपने अस्तित्व की अंतिम संघर्ष कर रहे हैं। जहां तक 2026 को लेकर जिस तरह के रुझान मिल रहे हैं। लगता है बंगाल की आम जन मानस एक बार फिर अपनी लोकतान्त्रिक परिपक्वता को साबित कर देश को कायल कर सकती है। इति शुभम।

– कुमार जगदली ‘सुनील ‘
रायपुर, छत्तीसगढ़।
7999515385

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