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डी पी घृतलहरे:- एक प्रेरक व्यक्तित्व हर पल समाज को किया समर्पित
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डी पी घृतलहरे:- एक प्रेरक व्यक्तित्व हर पल समाज को किया समर्पित

ji अश्वनी कुमार "फागुलाब" उनके बारे में जानने योग्य महत्वपूर्ण बातें :-- सतलोकी डेरहू प्रसाद घृतलहरे जी का सतलोक गमन 19- 04- 2020 दिन रविवार को दोपहर 12 बजे रायपुर के एक निजी अस्पताल में हो गया।। उनका जन्म 28- 06- 1949 को पिता श्री सुखरु प्रसाद घृतलहरे जी के घर ग्राम चक्रवाय, जिला बेमेतरा , छ ग में हुआ था।। वे 71 वर्ष के थे।। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे और अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था।। 1/ वे बहुत निर्धन परिवार में से थे। गरीबी की वजह से मेट्रिक पास भी नही कर पाए थे।। 2/ वे प्रारम्भिक दिनों में नाचा पार्टी में महिला कलाकार की भूमिका निभाते थे।। 3/ सबसे पहले वे गाँव में सरपंच बने।। उनके कार्यकाल , व्यवहार कुशलता, विनम्रता, योग्यता और जनता के कार्यो के प्रति समर्पण की काबिलियत के कारण क्षेत्र के कांग्रेसी नेताओं ने 1980 के विधानसभा चुनाव में विधायक प्रत्यासी के लिए अनुस...
सोशल मीडिया को ज्ञान का श्रोत बनाकर शिक्षक की भांती समाज जागृत करने निकल पड़े साथियों से मेरी यही विनती है  राजेश बिस्सा
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सोशल मीडिया को ज्ञान का श्रोत बनाकर शिक्षक की भांती समाज जागृत करने निकल पड़े साथियों से मेरी यही विनती है राजेश बिस्सा

प्रिय युवाओं सादर वंदे *वक्त बहुत कम है देख, यूं ही न निकल जाए* *बन जा तू पूरब दिशा, सूरज तो निकल पाए* सोशल मीडिया को ज्ञान का श्रोत बनाकर शिक्षक की भांती समाज जागृत करने निकल पड़े साथियों से मेरी यही विनती है कि अपनी जवाबदारियों को समझिये। देश आपकी ओर आशा भरी नजरों से देख रहा है। युवा पानी की वह धार है जो सही दिशा में चली गई तो क्रांति लाती है। गलत दिशा चली गयी तो बर्बादी लाती है। और अगर धारा के साथ बहकर रह गई तो सागर में मिलकर स्वयं को नष्ट कर लेती है। नदिया की धारा से जो पानी अलग होकर सही दिशा में बहता है वही सृष्टि का रक्षक, विकास का पोषक और सुख-समृद्धि का वाहक होता है। खेती, किसानी, कल-कारखाने, विकास के हर पहलू इसका जीवंत उदाहरण हैं। नदी की धारा के साथ जो बहता चला जाता है वह अंततः सागर में गिर कर अपने अस्तित्व को खत्म कर लेता है। युवाओं को अपनी दिशा बहुत सोच समझकर ...
विश्व के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में से एक थे डॉ अंबेडकर, लेकिन हमने उन्हें एक फ्रेम में कैद कर दिया..
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विश्व के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में से एक थे डॉ अंबेडकर, लेकिन हमने उन्हें एक फ्रेम में कैद कर दिया..

प्रियंका कौशल वरिष्ठ पत्रकार,लेखक,चिंतक 14 अप्रैल को बाबा  डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती है। इसी बहाने आईये अंबेडकर को सही मायनों में समग्र रूप में जाने। देश में बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबा साहब डॉ भीमराव #अंबेडकर विश्व के एक सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री थे। समाजिक व राजनीतिक नेता वे बाद में थे, पहले एक अर्थशास्त्र के विद्यार्थी, फिर अध्यापक और फिर महान शोधार्थी थे। समस्या ये हुई कि उन्हें केवल दलित नेता, संविधान निर्माता और बाद में राजनेता की फ्रेम में कैद कर दिया गया। उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को देश जान ही नहीं पाया। उन्होंने अर्थशास्त्र के विषयों पर एक नहीं वरन दो पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। पहली लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से..दूसरी कोलंबिया विश्वविद्यालय से। उनकी अनुशंसाओं के आधार पर भारतीय #रिजर्व बैंक का गठन हुआ। देश में सरकारी वित्त में भ्रष्टाचार रोकने के लिए #महालेखाकार की स्थ...
कोरोना संकट : भारत, केरल और छत्तीसगढ़ — दो तस्वीरें
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कोरोना संकट : भारत, केरल और छत्तीसगढ़ — दो तस्वीरें

  लेखक संजय पराते वामपंथी कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ किसान सभा के अध्यक्ष हैं ? कल लॉक डाऊन के पहले चरण का आखिरी दिन है और इसके बाद दूसरा चरण शुरू हो जाएगा। 21 दिनों की तालाबंदी में संघी गिरोह ने खूब थाली-घंटे बजवाये, खूब मोमबत्ती-टॉर्च जलवाए, लेकिन कोरोना का हमला थमने का बजाए बढ़ता ही गया है। कल दस बजे जब *जिल्ले इलाही* संबोधित कर रहे होंगे, तो कोरोना संक्रमितों की संख्या दस हजार छू रही होगी और इस महामारी से मरने वालों की संख्या तो 300 पार कर ही चुकी है। लेकिन वे यह नहीं बताएंगे कि उनकी *वैदिक ग्रंथों से खोजकर निकाली गई वैदिक दवाई* इस महामारी को फैलने से क्यों नहीं रोक पाई? वे यह भी नहीं बताएंगे कि इस महामारी का इलाज चिकित्सा विज्ञान से ही संभव है, क्योंकि तब उन्हें बताना पड़ेगा कि हमारे देश में कितने टेस्टिंग किट, कितने वेंटिलेटर्स, कितने पीपीई, कितने मास्क, कितने दस्ताने, कितनी द...
कौन है जो हमारी बारूद गीली कर रहा है?*
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कौन है जो हमारी बारूद गीली कर रहा है?*

(आलेख : बादल सरोज लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अ.भा. किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।) 1757 भारतीय इतिहास का विडंबना वर्ष है। इसी साल प्लासी का लगभग अनहुआ युद्ध जीत कर ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने राज की शुरुआत की थी। रानी एलिजाबेथ से भारत से व्यापार की 21 साल की अनुमति लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी बन तो 1600 में ही गयी थी। इसका पहला जहाज और दूत भी 1608 में ही आ गया था। मगर कंपनी राज की शुरुआत प्लासी की लड़ाई के बाद ही हुयी। बाद में सीधे विक्टोरिया के राज में बदल कर यह गुलामी अगली 190 वर्ष तक इस महान देश को अपनी बेड़ियों में जकड़े रही। कहते हैं कि इस युद्ध में बंगाल के हारने की कोई वजह नहीं थी। जीत इतनी तय थी कि नबाब सिराजुद्दौला जंग शुरू होने के पहले ही मीर जाफर के भरोसे सेना और लड़ाई को छोड़कर वापस चल दिए थे। जिस ग़द्दारी के लिए मीर जाफर एक उपमा बन गए, उसकी वजह से क्लाइव की फौजें जीत गयीं और...
दांडी यात्रा के 90 वर्षगाठ पर संजय का स्मरण
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दांडी यात्रा के 90 वर्षगाठ पर संजय का स्मरण

    75 बर्षगांठ पर कांग्रेस पार्टी द्वारा 12 मार्च 2005 को इस यात्रा का आयोजन किया गया था ।जिसमे पूरे देश से 88 लोगो का चयन किया गया था ।जिसमे छ ग से मेरा चयन किया गया। के   संजय सिंग ठाकुर   ........ आप सभी को दांडी यात्रा की 90 वी वर्षगांठ कि बहुत बहुत बधाई ।महात्मा गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को अंग्रेजो के बनाऐ नमक कानून का विरोध करने के लिए साबमती से दांडी तक 386 किलोमीटर का दांडी मार्च किया था ।जो कि 26 दिन चलने के पश्चात 6 अप्रैल को दांडी मे समाप्त हुई थी ।इसकी 75 बर्षगांठ पर कांग्रेस पार्टी द्वारा 12 मार्च 2005 को इस यात्रा का आयोजन किया गया था ।जिसमे पूरे देश से 88 लोगो का चयन किया गया था ।जिसमे छ ग से मेरा चयन किया गया था ।इस यात्रा मे हमने 386 किलोमीटर चलने के दौरान हजारो लोगो से मिले ।गुजरात कि यह यात्रा हमारे जीवन का अविस्मरणीय पल था जो हमेशा याद रहेगा ।...
लेकिन, किन्तु, परन्तु, अगर, मगर, फिर भी — से परे है मोरोना वायरस
रायपुर, लेख-आलेख

लेकिन, किन्तु, परन्तु, अगर, मगर, फिर भी — से परे है मोरोना वायरस

--- लेखक बादल सरोज वामपंथी कार्यकर्ता और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव है¯ ◆ इंदौर की टाटपट्टी बाखल में कोरोना संभावित बुजुर्ग को जांच के लिए लेने गयी डॉ ज़ाकिया सैयद और नर्सेज, पैरा मेडिकल स्टाफ के साथ जिस तरह की बेहूदगी और बदतमीजी हुयी उसकी सिर्फ निंदा, भर्त्सना और मज़म्मत ही की जा सकती है। उसे लेकर किसी भी लेकिन, किन्तु, परन्तु, अगर, मगर, फिर भी जैसी पतली गली तलाशना किसी मुकाम पर नहीं पहुंचाता। ऐसा करने वाले, कुछ जाने में और काफी कुछ अनजाने में, उन्ही मूर्ख शोहदों की जमात में खड़े होते हैं, जिन्होंने इस मेडिकल टीम पर पत्थर फेंके, उन पर थूका, उन्हें अपनी बाखल से खदेड़ बाहर किया। उनमें और इन किन्तुआरियों-परंतुकारियों-लेकिनधारियों में अंतर सिर्फ इतना है कि उनके हाथ में गालियां और पत्थर थे, इनके हाथ में शब्द और कुतर्क हैं। वरना दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुयी। ◆ बात शुरू करने से पह...
ताली-थाली-शंख के बाद अब गाल बजाओ!!
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ताली-थाली-शंख के बाद अब गाल बजाओ!!

आलेख : संजय पराते                                      (लेखक वामपंथी कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ किसान सभा के अध्यक्ष हैं।) प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश को 21 दिन के लिए लॉक डाउन करने की घोषणा के बाद अब स्पष्ट है कि कोरोना वायरस का हमला भारत में सामुदायिक संक्रमण (कम्युनिटी ट्रांसमिशन) के तीसरे चरण में प्रवेश कर गया है। इस चरण में यह वायरस मनुष्य द्वारा मनुष्य से ही नहीं फैलता, बल्कि मानव समाज पर हवा और सतह से भी वार करने लगता है। अतः संक्रमण के स्रोत का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। भारत जैसे देश में, जहां विकसित देशों की तुलना में उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं तक आम जनता की पहुंच नहीं के बराबर है और जहां निजीकरण के चलते स्वास्थ्य सुविधाओं का खचड़ा बैठ गया है और जिसके सीधे प्रमाण इस तथ्य से जाहिर होते हैं कि चिकित्सकों सहित हमारे तमाम स्वास्थ्य कर्मी अति-आवश्यक मास्क, दस्तानों, बॉडी कवर और सैनिट...
23 मार्च शहादत पर विशेष लेख भगतसिंह और आज की चुनौतियां
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23 मार्च शहादत पर विशेष लेख भगतसिंह और आज की चुनौतियां

  23 मार्च कल भगत  सिंह, सुखदेव, राजगुरु की शहादत दिवस                                                             आलेख : --संजय पराते    भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा दी गई थी और अपनी शहादत के बाद वे हमारे देश के उन बेहतरीन स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में शामिल हो गये, जिन्होने देश और अवाम को निःस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं दी। उन्होंने अंगेजी साम्राज्यवाद को ललकारा। मात्र 23 साल की उम्र में उन्होनें शहादत पाई, लेकिन शहादत के वक्त भी वे आजादी के आंदोलन की उस धारा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जो हमारे देश की राजनैतिक आजादी को आर्थिक आजादी में बदलने के लक्ष्य को लेकर लड़ रहे थे, जो चाहते थे कि आजादी के बाद देश के तमाम नागरिको को जाति, भाषा, संप्रदाय के परे एक सुंदर जीवन जीने का और इस हेतु रोजी-रोटी का अधिकार मिले। निश्चित ही यह लक्ष्य अमीर और गरीब के बीच असमानता को खत्म ...
कोरोना वायरस : सोशल डिस्टेंसिंग पर अमल के लिए क्या प्रधानमंत्री वाकई गंभीर है?
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कोरोना वायरस : सोशल डिस्टेंसिंग पर अमल के लिए क्या प्रधानमंत्री वाकई गंभीर है?

आलेख : संजय पराते कोरोना वायरस यदि विश्वव्यापी महामारी का जनक है, तो उससे लड़ने के लिए किसी भी देश के पूरे संसाधनों को झोंक देना चाहिए। भारत के लिए भी यही होना चाहिए। विभिन्न देशों ने इससे लड़ने के लिए सैकड़ों अरबों डॉलर : मसलन अमेरिका ने 850 अरब डॉलर, यूनाइटेड किंगडम ने 440 अरब डॉलर (जीडीपी का 15%), स्पेन ने 220 अरब डॉलर, कनाडा ने 82 अरब डॉलर, फ्रांस ने 50 अरब डॉलर (जीडीपी का 2%) और स्वीडन ने 30 अरब डॉलर झोंक दिए हैं, ताकि स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाया जा सके और अर्थव्यवस्था में पहले से चली आ रही मंदी के ऊपर से आई इस विपदा की जो मार आम जनता के जीवन पर पड़ रही है, उससे अपने देश के नागरिकों को राहत दी जा सके। इस वायरस के हमले का सीधा संबंध शरीर की प्रतिरोधक क्षमता से है और यह जरूरी है कि इस संकटकाल में न केवल किसी व्यक्ति के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बनाकर रखा जाए, बल्कि इस क्षमता क...