
कृषि विज्ञान केन्द्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने किसानों को नैनो उर्वरकों के उपयोग एवं लाभों की जानकारी देते हुए बताया कि रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया का लगातार एवं अत्यधिक उपयोग प्रारंभिक अवस्था में फसलों को लाभ पहुंचाता है, लेकिन लंबे समय में इसका प्रतिकूल प्रभाव मिट्टी की गुणवत्ता तथा उसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों पर पड़ सकता है। ऐसे में नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी किसानों के लिए बेहतर विकल्प के रूप में उपलब्ध हैं।
उन्होंने बताया कि नैनो यूरिया का उपयोग पर्णीय छिड़काव (फोलियर स्प्रे) के रूप में किया जाता है। पौधे इसकी पत्तियों के माध्यम से पोषक तत्वों का अवशोषण करते हैं, जिससे इसकी उपयोग दक्षता लगभग 80 प्रतिशत तक रहती है। नैनो यूरिया का उपयोग 4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से किया जाना चाहिए तथा 500 मिलीलीटर की एक बोतल एक एकड़ क्षेत्र के लिए पर्याप्त होती है।
डॉ. कुमार ने बताया कि नैनो यूरिया के बेहतर परिणाम के लिए इसका छिड़काव दो चरणों में किया जाना चाहिए। पहला छिड़काव फसल की 30 से 35 दिन की अवस्था में तथा दूसरा छिड़काव 55 से 60 दिन की अवस्था में करने पर शोध के अनुसार बेहतर उत्पादन प्राप्त होता है।
नैनो डीएपी के संबंध में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि यह फसलों को फास्फोरस उपलब्ध कराने का एक प्रभावी माध्यम है। इसका उपयोग बीजोपचार के रूप में भी किया जा सकता है। बीजोपचार हेतु 5 मिलीलीटर नैनो डीएपी प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपयोग करने की सलाह दी गई है। इसके अतिरिक्त 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से पर्णीय छिड़काव करने पर भी फसलों में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं।
उन्होंने बताया कि नैनो उर्वरक सीधे पौधों द्वारा अवशोषित किए जाते हैं, जिससे इनका प्रभाव मिट्टी पर कम पड़ता है और भूमि की उर्वरता एवं उत्पादकता लंबे समय तक सुरक्षित बनी रहती है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट नहीं आती तथा फसल उत्पादन में भी सकारात्मक वृद्धि देखने को मिलती है।
डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने किसानों से अपील की कि वे नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी का वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुरूप सही समय एवं सही मात्रा में उपयोग करें, जिससे कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के साथ-साथ मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दिया जा सके।








