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व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के निर्माण नियमों में शासन सहृदयता पूर्वक करे पुनर्विचार

जैसे-जैसे शहरीकरण अपने चरम पर पहुंच रहा है वैसे-वैसे नए-नए मार्केट भी डेवलप हो रहे हैं।  परंतु समस्या पुराने शहरों की है जो घनी बस्ती के रूप में बसे हुए हैं। यहां पर जो दुकानें बनी हुई है उसके अलावा यदि कोई नया दुकान बनाना चाहता है तो उसे नियमानुसार अपने भूमि का लगभग 50%  हिस्सा छोड़ना पड़ता है। परंतु शहर की जमीन इतनी महंगी हो चुकी है कि अब कोई भी व्यक्ति इतनी महंगी जमीन को छोड़ना नहीं चाहता है। इसलिए शहरों में नक्शे तो नियमानुसार बनते हैं परंतु निर्माण नियमों के विपरीत किए जाते हैं। और फिर दुकानदार यह राह देखते हैं की कब नियमितीकरण का द्वार खुलेगा और कब उसमें से पार हो पाएंगे।वैसे भी यह तो समझ में आता है की पार्किंग के लिए सामने का हिस्सा छोड़ना चाहिए परंतु यह समझ में नहीं आता कि अगल-बगल और पीछे की जमीन क्यों छोड़नी चाहिए। जब एक लाइन से दुकान बन रही हैं तो उनके बीच और पीछे यदि जगह छोड़ी जाएगी तो यह चोरों और सेंधमारों के लिए मुनासिब स्थितियां तैयार करता है।  ऐसे सैकड़ों प्रकरण देखे गए हैं जिसमें पीछे की ओर से सेंधमारी हुई है और दुकान का लाखों रुपए का नुकसान हो गया है ।अतः जो निर्माण व्यावसायिक प्रवृत्ति के हैं उन्हें पार्किंग के लिए सामने जगह छोड़नी चाहिए पर ऊपर वाली मंजिल का निर्माण उसे पूरे भूमि का ही मिलना चाहिए। इस संदर्भ में प्रदेश चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रियल एसोसिएशन जिला इकाई रायगढ़ के अध्यक्ष हीरा मोटवानी एवं महामंत्री राजेश अग्रवाल ने आगे कहा कि नगरीय निकायों में  एफएआर की वर्तमान दर भी बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अपने दुकान के सामने दो पहिया वाहन पार्क करने की जगह तो दुकानदार बना देगा पर चार पहिया पार्क करने के लिए संबंधित नगरीय निकाय को मार्केट के आसपास  दो-तीन पार्किंग स्थल भी बनाने चाहिए ताकि चार पहिया वाहन वाहन पार्क हो जाए और ट्रैफिक की समस्या ना बने।  यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्य मार्ग पर स्थित भूमि में जो की आवासीय मद में चल रही है उन्हें व्यवसायिक व्यपवर्तन की अनिवार्यता से मुक्त करना चाहिए। भले ही उसका टैक्स व्यावसायिक दर पर लिया जाए परंतु कागजी कार्यवाही को खत्म करना चाहिए। इससे नगरीय निकायों को भी बड़ी रकम राजस्व के रूप में प्राप्त होगी।  वैसे भी छत्तीसगढ़ में व्यापार की स्थिति अत्यंत दयनीय है ऐसे में जब नौकरियां ही नहीं है तो लोग अपना व्यवसाय व्यापार करना चाहते हैं लेकिन व्यापार करने के लिए भी इतनी सारे नियम हैं कि उन नियम कानून को पूरा करते-करते व्यापारी की कमर टूट जाती है।  ऐसे में प्रदेश शासन को अत्यंत सहृदयता पूर्वक विचार करते हुए नए बाजारों के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए।  जिससे शहर के भीतर दुकानों का निर्माण हो सके और जो लोग शहर छोड़ कर आउटर की नई कॉलोनी में बसना चाहते हैं वह अपने पुराने भूमि को किसी छोटे-मोटे व्यावसायिक परिसर का रूप दे सकें जिससे मार्केट निर्माण के बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो। 
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